Monday, 11 May 2020

कहानी राजस्थान के शूरवीर महाराणा प्रताप की..✍️

1.महाराणा प्रताप सिंह सिसोदिया उदयपुर, मेवाड में सिसोदिया राजपूत राजवंश के राजा थे। उनका नाम इतिहास में वीरता और दृढ प्रण के लिये अमर है। उन्होंने मुगल सम्राट अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की और कई सालों तक संघर्ष किया। महाराणा प्रताप सिंह ने मुगलों को कईं बार युद्ध में भी हराया। विकिपीडिया
जन्म: 9 मई 1540, कुम्भलगढ़ फोर्ट, क़िला कुम्भलगढ़
मृत्यु: 19 जनवरी 1597, चवंद
ऊंचाई: 2.26 मी
राज्याभिषेक: 28 फ़रवरी1572
पति/पत्नी: अजबदे पंवार (विवा. 1557–1597), अमरबाई राठौर (विवा. ?–1597), ज़्यादा
बच्‍चे: अमर सिंह, कुँवर दुर्जन सिंह, कुँवर पूरन मल, शेख सिंह, सहस मल, भगवान दास
2.जन्म, वंश और आराध्यदेव एकलिंग महादेव

राजपूताना राज्यों में मेवाड़ का अपना एक विशिष्ट स्थान है जिसमें इतिहास के गौरव बाप्पा रावल, खुमाण प्रथम, महाराणा हम्मीर, महाराणा कुम्भा, महाराणा सांगा और उदयसिंह ने जन्म लिया. मेवाड़ के महाराजा उदयसिंह और माता राणी जीवत कंवर के घर में महाराणा प्रताप का जन्म हुआ था. वे राणा सांगा के पोते थे. मेवाड़ में सिसोदिया राजवंश के कुल देवता एकलिंग महादेव हैं. आराध्यदेव एकलिंग महादेव का मेवाड़ के इतिहास में बहुत महत्व है. मेवाड़ के संस्थापक बप्पा रावल ने 8वीं शताब्‍दी में उदयपुर में इस मंदिर का निर्माण करवाया और एकलिंग की मूर्ति की प्रतिष्ठापना की थी.

3.बाल्यकाल: कीका और चेतक की कहानी

बचपन और युवावस्था में महाराणा प्रताप को कीका नाम से भी पुकारा जाता था. ये नाम उन्हें जंगल में पिता के नजदीकी भील परिवारों से मिला था. भीलों की बोली में कीका का मतलब बेटा होता है. महाराणा प्रताप के पास शुरू से ही चेतक नाम का एक सबसे प्रिय घोड़ा था. उनकी वीरता के साथ ही लोग चेतक की स्वामी भक्ति की कहानियां भी सुनाते हैं.



4.मध्यकालीन भारतीय इतिहास का सबसे चर्चित हल्दीघाटी युद्ध

देश पर आक्रमण करने वाले विदेशी और खूंखार मुगलों से महाराणा प्रताप ने कई लड़ाइयां लड़ीं. इनमें सबसे ऐतिहासिक लड़ाई हल्दीघाटी मैदान में हुई. हल्दीघाटी का युद्ध मध्यकालीन भारतीय इतिहास का सबसे चर्चित युद्ध है. इसमें मानसिंह की अगुवाई वाली अकबर की विशाल सेना से उन्होंने सामना किया. साल 1576 में हुए इस जबरदस्त युद्ध में करीब 20 हजार सैनिकों के साथ महाराणा प्रताप ने 80 हजार मुगल सैनिकों का सामना किया था. इसमें महाराणा प्रताप का घोड़ा चेतक जख्मी हो गया था. इसके बाद मेवाड़, चित्तौड़, गोगुंडा, कुंभलगढ़ और उदयपुर पर मुगल आक्रांताओं का कब्जा हो गया था. अधिकांश राजपूत राजा मुगलों के अधीन हो गए. इन सबके बीच महाराणा प्रताप ने कभी भी स्वाभिमान का साथ नहीं छोड़ा.

5. हल्दीघाटी का युद्ध मुगल बादशाह अकबर और महाराणा प्रताप के बीच 18 जून, 1576 ई. को लड़ा गया था. अकबर और महाराणा प्रताप के बीच यह युद्ध महाभारत युद्ध की तरह विनाशकारी सिद्ध हुआ था.


6. ऐसा माना जाता है कि हल्दीघाटी के युद्ध में न तो अकबर जीत सका और न ही राणा हारे. मुगलों के पास सैन्य शक्ति अधिक थी तो राणा प्रताप के पास जुझारू शक्ति की कोई कमी नहीं थी.


7. आपको बता दें हल्दी घाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप के पास सिर्फ 20000 सैनिक थे और अकबर के पास 85000 सैनिक. इसके बावजूद महाराणा प्रताप ने हार नहीं मानी और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करते रहे.

8. बताया जाता है जब युद्ध के दौरान मुगल सेना उनके पीछे पड़ी थी तो चेतक ने महाराणा प्रताप को अपनी पीठ पर बैठाकर कई फीट लंबे नाले को पार किया था.आज भी चित्तौड़ की हल्दी घाटी में चेतक की समाधि बनी हुई है.

9. हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप की तरफ से लडने वाले सिर्फ एक मुस्लिम सरदार था -हकीम खां सूरी.

10. कहते हैं कि अकबर ने महाराणा प्रताप को समझाने के लिए 6 शान्ति दूतों को भेजा था, जिससे युद्ध को शांतिपूर्ण तरीके से खत्म किया जा सके, लेकिन महाराणा प्रताप ने यह कहते हुए हर बार उनका प्रस्ताव ठुकरा दिया कि राजपूत योद्धा यह कभी बर्दाश्त नहीं कर सकता.

11. हल्दीघाटी की लड़ाई में उनका वफादार घोड़ा चेतक गंभीर रूप से जख्मी होने की वजह से मारा गया. लेकिन इस शहादत ने उसे खासी शोहरत दिलाई.

12. मेवाड़ को बचाने के लिए आखिरी सांस तक लड़ने वाले महाराणा प्रताप 6 बार अकबर को बादशाह मानकर मेवाड़ में राज चलाने की पेशकश ठुकराई. उन्हें किसी 'विदेशी' का राज स्वीकार नहीं था.

13. महाराणा प्रताप का सबसे प्रिय घोड़ा चेतक था. महाराणा प्रताप की तरह ही उनका घोड़ा चेतक भी काफी बहादुर था.

14. हवा से बात करता घोड़ा चेतक
चेतक महाराणा का सबसे प्रिय घोड़ा था. हल्दीघाटी में महाराणा बहुत घायल हो गये थे, उनके पास कोई सहायक नहीं था. ऐसे में महाराणा ने चेतक की लगाम थामी और निकल लिए. उनके पीछे दो मुग़ल सैनिक लगे हुए थे, पर चेतक की रफ़्तार के सामने दोनों ढीले पड़ गए. रास्ते में एक पहाड़ी नाला बहता था. चेतक भी घायल था पर छलांग मार नाला फांद गया और मुग़ल सैनिक मुंह ताकते रह गए. लेकिन अब चेतक थक चुका था. वो दौड़ नहीं पा रहा था. महाराणा की जान बचाकर चेतक खुद शहीद हो गया.

15. घास की रोटियां
जब महाराणा प्रताप अकबर से हारकर जंगल-जंगल भटक रहे थे एक दिन पांच बार भोजन पकाया गया और हर बार भोजन को छोड़कर भागना पड़ा. एक बार प्रताप की पत्नी और उनकी पुत्रवधू ने घास के बीजों को पीसकर कुछ रोटियां बनाईं. उनमें से आधी रोटियां बच्चों को दे दी गईं और बची हुई आधी रोटियां दूसरे दिन के लिए रख दी गईं. इसी समय प्रताप को अपनी लड़की की चीख सुनाई दी. एक जंगली बिल्ली लड़की के हाथ से उसकी रोटी छीनकर भाग गई और भूख से व्याकुल लड़की के आंसू टपक आये. यह देखकर राणा का दिल बैठ गया. अधीर होकर उन्होंने ऐसे राज्याधिकार को धिक्कारा, जिसकी वज़ह से जीवन में ऐसे करुण दृश्य देखने पड़े. इसके बाद अपनी कठिनाइयां दूर करने के लिए उन्होंने एक चिट्ठी के जरिये अकबर से मिलने की इच्छा जता दी.


16. सारी की सारी जनता थी राणा की सेना
राणा प्रताप का जन्म कुम्भलगढ़ के किले में हुआ था. ये किला दुनिया की सबसे पुरानी पहाड़ियों की रेंज अरावली की एक पहाड़ी पर है. राणा का पालन-पोषण भीलों की कूका जाति ने किया था. भील राणा से बहुत प्यार करते थे. वे ही राणा के आंख-कान थे. जब अकबर की सेना ने कुम्भलगढ़ को घेर लिया तो भीलों ने जमकर लड़ाई की और तीन महीने तक अकबर की सेना को रोके रखा. एक दुर्घटना के चलते किले के पानी का सोर्स गन्दा हो गया. जिसके बाद कुछ दिन के लिए महाराणा को किला छोड़ना पड़ा और अकबर की सेना का वहां कब्ज़ा हो गया. पर अकबर की सेना ज्यादा दिन वहां टिक न सकी और फिर से कुम्भलगढ़ पर महाराणा का अधिकार हो गया. इस बार तो महाराणा ने पड़ोस के और दो राज्य अकबर से छीन लिए.

17. भाई शक्ति सिंह विरोधी हो गए थे, फिर प्रेम जाग गया
हल्दीघाटी के बाद महाराणा जब बचकर कुछ दूर पहुंच गए उसी समय महाराणा को किसी ने पीछे से आवाज लगाई- “हो, नीला घोड़ा रा असवार.” महाराणा पीछे मुड़े तो उनका भाई शक्तिसिंह आ रहा था. महाराणा के साथ शक्ति की बनती नहीं थी तो उसने बदला लेने को अकबर की सेना ज्वाइन कर ली थी और जंग के मैदान में वह मुगल पक्ष की तरफ से लड़ रहा था. युद्ध के दौरान शक्ति सिंह ने देखा कि महाराणा का पीछा दो मुगल घुड़सवार कर रहे हैं. तो शक्ति का पुराना भाई-प्रेम जाग गया और उन्होंने राणा का पीछा कर रहे दोनों मुगलों को मारकर ऊपर पहुंचा दिया.

18. महाराणा प्रताप का भाला 81 किलो वजन का था और उनके छाती का कवच 72 किलो का था. उनके भाला, कवच, ढाल और साथ में दो तलवारों का वजन मिलाकर 208 किलो था.


19. अकबर से लेकर लिंकन तक बने प्रशंसक

कहते हैं कि महाराणा प्रताप के निधन के बारे में जानकर अकबर की आंखें भी छलक गई थी. मुगल दरबार के कवि अब्दुर रहमान ने लिखा है, ‘इस दुनिया में सभी चीज खत्म होने वाली है. धन-दौलत खत्म हो जाएंगे, लेकिन महान इंसान के गुण हमेशा जिंदा रहेंगे. प्रताप ने धन-दौलत को छोड़ दिया, लेकिन अपना सिर कभी नहीं झुकाया. हिंद के सभी राजकुमारों में अकेले उन्होंने अपना सम्मान कायम रखा.’
हल्दीघाटी के गाइड सैलानियों को यह भी सुनाते हैं कि एक बार अमेरिका के भूतपूर्व राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन भारत के दौरे पर आ रहे थे, तो उन्होंने अपनी मां से पूछा… मैं आपके लिए भारत से क्या लेकर आऊं. उनकी मां ने कहा था भारत से तुम हल्दीघाटी की मिट्टी लेकर आना जिसे हजारों वीरों ने अपने रक्त से सींचा है.

20. महाराणा प्रताप और उनके अस्त्र-शस्त्र

महाराणा प्रताप की लंबाई 7 फीट और वजन 110 किलोग्राम था. उनका भाला 81 किलो वजन का था और उनके छाती का कवच 72 किलो का था. उनके भाला, कवच, ढाल और साथ में दो तलवारों का वजन मिलाकर 208 किलो वजन था. ये सभी आज भी चित्तौड़गढ़ और कुंभलगढ़ के संग्रहालयों में रखे हैं. 1596 में शिकार खेलते समय उन्हें चोट लगी जिससे वह कभी उबर नहीं पाए. 19 जनवरी 1597 को सिर्फ 57 वर्ष आयु में चावड़ में उनका निधन हो गया.


21. कभी स्वीकार नहीं की मुगल आक्रांताओं की अधीनता

महाराणा प्रताप ने कभी भी मुगल बादशाह जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की. अकबर की अनीति और धोखे से भरी 30 वर्षों के लगातार कोशिशों के बावजूद वह महाराणा प्रताप को बंदी बनाने की नापाक हसरत पूरी नहीं कर सका. महाराणा ने कई सालों तक लगातार संघर्ष किया. साल 1582 में दिवेर के युद्ध में महाराणा प्रताप ने उन क्षेत्रों पर फिर से कब्जा जमा लिया था जो कभी मुगलों ने हथिया लिए थे. इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉ ने मुगलों के साथ हुए इस युद्ध को मेवाड़ का मैराथन कहा था. 1585 तक लंबे संघर्ष के बाद महाराणा प्रताप अपने मेवाड़ को पूरी तरह मुक्त करने में सफल रहे. महाराणा प्रताप फिर से मेवाड़ के सिंहासन पर बैठे थे.


22. अकबर भी तारीफ किए बिना नहीं रह सका
जब महाराणा प्रताप अकबर से हारकर जंगल-जंगल भटक रहे थे. अकबर ने एक जासूस को महाराणा प्रताप की खोज खबर लेने को भेजा गुप्तचर ने आकर बताया कि महाराणा अपने परिवार और सेवकों के साथ बैठकर जो खाना खा रहे थे उसमें जंगली फल, पत्तियाँ और जड़ें थीं. जासूस ने बताया न कोई दुखी था, न उदास. ये सुनकर अकबर का हृदय भी पसीज गया और महाराणा के लिए उसके ह्रदय में सम्मान पैदा हो गया. अकबर के विश्वासपात्र सरदार अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना ने भी अकबर के मुख से प्रताप की प्रशंसा सुनी थी. उसने अपनी भाषा में लिखा, “इस संसार में सभी नाशवान हैं. महाराणा ने धन और भूमि को छोड़ दिया, पर उसने कभी अपना सिर नहीं झुकाया. हिंदुस्तान के राजाओं में वही एकमात्र ऐसा राजा है, जिसने अपनी जाति के गौरव को बनाए रखा है.” उनके लोग भूख से बिलखते उनके पास आकर रोने लगते. मुगल सैनिक इस प्रकार उनके पीछे पड़ गए थे कि भोजन तैयार होने पर कभी-कभी खाने का अवसर भी नहीं मिल पाता था और सुरक्षा के कारण भोजन छोड़कर भागना पड़ता था.

23. वफादार मुसलमान ने बचाई थी महाराणा की जान
1576 में महाराणा प्रताप और अकबर की सेना के बीच यह युद्ध हुआ. अकबर की सेना को मानसिंह लीड कर रहे थे. बताते हैं कि मानसिंह के साथ 10 हजार घुड़सवार और हजारों पैदल सैनिक थे. लेकिन महाराणा प्रताप 3 हजार घुड़सवारों और मुट्ठी भर पैदल सैनिकों के साथ लड़ रहे थे. इस दौरान मानसिंह की सेना की तरफ से महाराणा पर वार किया जिसे, महाराणा के वफादार हकीम खान सूर ने अपने ऊपर ले लिया और उनकी जान बचा ली. उनके कई बहादुर साथी जैसे भामाशाह और झालामान भी इसी युद्ध में महाराणा के प्राण बचाते हुए शहीद हुए थे.


24. महाराणा प्रताप ने अपने जीवन में कुल 11 शादियां की थीं. कहा जाता है कि उन्होंने ये सभी शादियां राजनैतिक कारणों से की थीं.
 महाराणा प्रताप के 17 बेटे और 5 बेटियां थीं. बड़ी महारानी अजाब्दे के पुत्र हुए अमर सिंह महाराणा प्रताप के मृत्यु के बाद में उनके उत्तराधिकारी बने.


हरीश देवासी की कलम से..✍️ भूलवश कही भी त्रुटि हुई हो तो क्षमा करें 🙏🏼

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